आयुर्वेदिक चिकित्सा

चिकित्सा,उपचार,आयुर्वेद,

बस ऐसे ही…

Posted by परमजीत बाली on September 13, 2007

आज फिर मन बहुत उदास हो गया । समझ नही पाता ऐसा क्यूँ होता है। सब कुछ तो ठीक-ठाक चल रहा है। अब इस बारे में लिखना भी मुश्किल लग रहा है। कोई वजह भी नही सोच पा रहा कि आखिर मन क्यूँ उदास हो रहा है। कई बार लगता है कि मेरे पास मन नाम की कोई चींज है ही नही। शायद मैं बिना मन के जी रहा हूँ…लेकिन यह कैसे हो सकता है? मेरे पास इस का कोई जवाब नही है। मैं जानता हूँ……..बिना मन के  कोई नही जी सकता……शायद मेरे भीतर कोई जंग छिड़ी हुई है जो मुझे भटकाती रहती है……मै आप से पूछना चाहता हूँ क्या आप को कभी ऐसी उदासी ने घेरा है?….कहीं ऐसा तो नही…..यहाँ जो कुछ दुनिया मैं हो रहा है या चल रहा है……उस से हमारा ….या हम से उस का, कोई वास्ता भी है या नही ?….कही हम सभी बेबजह तो नही जी रहे?…..कुछ स्यानें लोग कहते हैं कि अगर दुनिया में आए हो तो लोगो की भलाई के लिए कुछ काम कर जाओ…मुझे समझ नही आता, यदि हमें किसी के लिए कुछ करना है तो दूसरे क्या करेगें?………कोई कहता है कि परमात्मा को पानें मे अपना जीवन लगा दो…उसे पाना ही जीवन का उद्देश्य है…..तो कोई उस परमात्मा से क्यूँ नही पूछता कि अगर हमें तुझे ही पाना था तो हमें अपने से अलग कर के यहाँ क्यों भेज दिया…आज मेरे पास इस का कोई उत्तर नही है…….मैं बस सोच रहा हूँ….देखो क्या होता है…..

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.